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आयुर्वेदिक शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की आवश्यकता : नीलेश कोर्डे

पंचकूला, 16 अप्रैल: 

राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, पंचकूला में आयुर्वेद के वैश्विकरण और उसकी महत्ता पर विशेष शैक्षणिक व्याख्यान का आयोजन किया गया। 

गोमांतक आयुर्वेदिक कॉलेज के प्रिंसिपल एवं रचना शरीर विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नीलेश कोर्डे ने बतौर मुख्य वक्ता विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि आयुर्वेद केवल भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि यह आज विश्व की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बनती जा रही है। 

आधुनिक जीवनशैली में मानसिक तनाव और पर्यावरणीय असंतुलन के बीच आयुर्वेद समग्र स्वास्थ्य का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। उन्होंने बताया कि विश्व के कई देशों में आयुर्वेद के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ रही है और भारत को इस क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए शोध, और आधुनिक तकनीकों के समन्वय की आवश्यकता है। उन्होंने आयुर्वेदिक शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने पर भी जोर दिया। 

प्रोफेसर प्रह्लाद रघु ने बताया कि आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में संस्थान के कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) संजीव शर्मा और डीन प्रोफेसर गुलाब चंद पमनानी के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों को शोध, नवाचार और आधुनिक तकनीकों बारे अवगत कराया जा रहा है, क्योंकि वर्तमान समय ज्ञान के साथ-साथ कौशल और शोध-आधारित सोच का है। आयुर्वेद के क्षेत्र में नवाचार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने  विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे आयुर्वेद की मूल भावना को समझें, उसे आधुनिक संदर्भ में विकसित करें।  एसिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आकांक्षा राणा ने विद्यार्थियों को आयुर्वेद के क्षेत्र में नवाचार और अनुसंधान के बारे में विस्तार से बताया।

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